बिनीत ठाकुर

बिनीत ठाकुर


बाँहिके गोदना कविता

 

रैहगेल निशानी आब बाँहीके गोदना

अनाहकमे मारल गेलै बुधनीके बुधना

 

उमेरोनै बेसी भेलरहै मात्र बिस

मरैतकाल राम बजलैनै ईश

फटलैजे बम शरीर भेलै चिथरा

दैवोनै गवाही कहबै की ककरा

 

लागल छै गाराभुकुर बुधनिके चिन्‍ता

के करतै आब पुरा ओकर बच्‍चाके सिहन्‍ता

देशेके लागलछै सतीक श्राण

एत सिधा सोझा जनताके केउ नै माई बाप

 

 भरल नोर मे

केहन  सपना  हम मीता देखलौँ भोर मे

माय  मिथिला  जगाबथि  भरल नोर मे

कहथि रने वने घुमी अपन अधिकार लेल

छैं तूँ सुतल छुब्ध छी तोहर बिचार लेल

 

कनिको  बातपर  हमरा  तूं करै  विचार

की सुतलासँ ककरो भेटलै अछि अधिकार

जोरि एक एक हाथ बनवै जो लाखों हाथ

कर हिम्मत तूं पुत्र छियौ हम तोहर साथ

 

अछि तोरापर बाँकी हमर  दूधक कर्ज

करै एहिबेर तूं पुरा सबटा अपन फर्ज

लौटादे  हमर  आब अपन स्वाभिमान

पुत्र तूं छै महान तोहर कर्म छौ महान

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