नरेश मोहन झा

नरेश मोहन झा        

तुलसिया, किशनगंज


विद्वद्वरेण्य पञ्जीकार
मोदानन्द झा

वर्ष १९५४-५५क वार्ता थीक। गृष्मावकाश छल। गामहिं छलहुँ। एक दिन वेरू प्रहर मे दरवज्जहिपर छलहुँ। एक व्यक्ति, अत्यन्त गौरवर्ण, मध्यम ऊँचाई, देदीप्यमान ललाट, प्रशस्त काया, चलबाक कारणँ ललौंछ मुखमण्डल, पैघ-पैघ आँखि, उपस्थित भेलाह। देखितहिं बुझबामे आएल जे कोनो महापुरुष अएलाह अछि। हमर पिता पं. लीलमोहन झा सेहो दलानेपर छलाह। ओऽ परम आह्लादित भए उठि कऽ ठाढ़ भेलाह। झटकि कऽ अरियाति अनलखिन्ह। हमरा सभ जतेक नवयुवक रही- सभकँ कहलन्हि- प्रणाम करहुन्ह। हमरो लोकनि उल्लसित एवं अनुशासित भए प्रणाम कएलियन्हि। बाल्टीमे जल, जलचौकी ओऽ अढ़िया आनल गेल। हुनकासँ पए धोएबाक आग्रह कएल गेलन्हि। हमर पिता जे परोपट्टाक श्रेष्ठ समादृत व्यक्ति छलाह- स्वयं लोटामे जल लए हुनकर पएर धोअय लगलखिन्ह। पुनः अंगपोछासँ पएर पोछि पलंगपर बिछाओल साफ सुन्दर विछाओनपर बैसेलखिन्ह। आ हुनक पएर धोयल जलसँ समस्त घर-आङनमे छिड़काव भेल। एहि बीच सरवत आएल- पान आएल। घरक सभ सदस्यमे एक अद्भुत उल्लास-जेना कोनो इष्टदेव आबि गेल होथि। ओहि बैसारमे तँ बहुत काल धरि कुशलादिक वार्ता होइत रहल। संध्याकाल धरि तँ हमर दरवज्जापर गाम भरिक ब्राह्मणक समूहक समूह उपस्थित होमऽ लागल। ओहि मध्य हमर पिता परिचय करौलन्हि। कहलन्हि- ई थिकाह पंजीकार प्रवर श्री मोदानन्द झा जी लब्ध धौत, शिवनगर, पूर्णियाँ निवासी। हमरा लोकनिक वंश रक्षक। हिनकहिं प्रतापे हमरा लोकनि अपन कुल ओऽ जातिक रक्षा कऽ पबैत छी। हिनक पिता पञ्जीशास्त्र मूर्धन्य पञ्जीकार भिखिया झा बड़ पैघ विद्वान् ओऽ सदाचार पालक। ओहि योग्य पिताक यशस्वी पुत्र छथि पञ्जीकार प्रवर मोदानन्द बाबू। नाम सुनितहिं अकचकयलहुँ। हम पूर्णियाँ कॉलेजक जखन छात्र रही तँ समस्त कुटुम्ब वर्ग बिष्णुपुर गामक मित्रवर्ग जे नवरतन पूर्णियाँमे रहैत छलाह तनिकासँ हिनक नाम बड़ श्रद्धापूर्वक उच्चरित होएत सुनने छलहुँ। अहि साक्षात्कार भेल सन्ता बुझि पड़ल जे जे किछु हिनकर मादे सुनने छलहुँ से बड़ कम छल। निश्चय ई व्यक्ति परम आदरणीय छथि। सांध्यकालीन बैसारमे गामक सभ श्रेष्ठ व्यक्ति अपन-अपन वंशक नवजन्मोत्पत्तिक विवरण लिखबैत गेलखिन्ह। पञ्जीकारजी तत्परतापूर्वक सभक परिचय बड़ मनोयोगसँ लिखैत रहलाह। तखन हमरा बुझाएल जे कोना कऽ हमरा लोकनिक वंश परिचय पछिला हजार वर्षसँ साङ्गो-पाङ्ग उपलब्ध रहल अछि। हमर गाम पञ्जीकार गामसँ १०० कि.मी.सँ अधिके पूर्वमे अवस्थित अछि। यातायातक कोनो सम्यक व्यवस्था पूर्वमे नहि रहल होएतैक। नाना प्रकारक असुविधाक सामना करैत एतैक भू-भागमे पसरल मैथिल ब्राह्मणक यावतो परिचय संग्रहित करब, सुरक्षित राखब आ बेर पड़लापर उपस्थित करब अत्यन्त दुःसाध्य कार्य। यात्रा ओ परिस्थिति जन्य कष्टक थोड़ेको अनुभव नहिं कऽ केँ अपन कर्तव्येक प्रधानता दैत निःस्वार्थ भावसँ धर्मशास्त्रक रक्षामे तत्पर एहि इतिहासक संरक्षण सन पुनीत कार्य करैत रहब हिनकहि सन व्यक्तिसँ संभव। प्रातः काल पूज्य पितासँ एकान्तमे पुछलियन्हि जे एतेक कष्ट उठा कऽ परिचय संग्रह करबाक प्रयोजन की? बुझौलन्हि जे अपना लोकनि जे सनातन धर्मावलम्बी से सभटा कार्य मनु, याज्ञवल्क्य, शतपथ, शंख इत्यादि महान् ऋषि लोकनिक देल व्यवस्थापर चलैत छी। मनु विवाहक सन्दर्भमे कहने छथि जे कोनो कन्या ओ वरक विवाह स्वजन, सगोत्र, सपिण्ड ओ समान प्रवरमे नहि हो। एहि हेतु आवश्यक अछि जे सपिण्ड्य निवृत्तिक ज्ञान हो। ताहि हेतु पुरुषाक विवाहादिक विवरण सम्पूर्णतः उपलब्ध हो। एहि धर्मक रक्षा तँ विन पञ्जीकारहिं सम्भव नहि। अन्यथा वर्णसंकरक प्रधानता होएत ओ जातीय रक्षा नहिं होएत। पञ्जीकारक नहिं रहने वंशक इतिहासक ज्ञान नष्ट भए जाएत।

विश्वास जमि गेल। हुनका प्रति मनमे जे आस्था छल से चतुर्गुण भऽ गेल। तकर बाद जखन कखनो ओऽ अएलाह हम ओहि देवत्व भावँ हुनक सम्मान कएल। ओहो पितृवत स्नेह देलन्हि। ओऽ अपन व्यक्तित्वक धनी छलाह। सदाचार पालनमे तत्पर। जखन कखनो हुनकर गामपर जएबाक अवसर भेटल- गमौलहुँ नहि। कतेको बेर हुनकर गाम शिवनगर गेल छी। हुनक ओऽ साफ परिछिन्न दलान। रमनगर फुलवाड़ी। पञ्जीकारजीक दैनिक चर्या कलम ओऽ खुरपीक संग सम्पन्न होइत छलन्हि। कर्मिष्ठ पुरुषः।



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