मनोज मुक्ति

मनोज मुक्‍ति


स्‍मिताक लडाई
पशुपतिनाथक देशमे होइछ व्‍यभिचार सब भेषमे
आन ठाम त बाते छोडू अबुह सगैत अछि अपनो देशमे।
प्रकृतिक देल ई आँखि, कान ओ बडका नाक आब दुश्‍मन प्रतीत होइया
सँसारमे अपन अलग छाप छोडने मिथिलावासी,डरपोकक हूलमे सरिक होइया।
अपना समस्‍त अधिकार सऽभसँ बन्‍चित होइतो,बँचल छी काइल्‍हुक आशामे
भ्रष्‍ट प्रशासन ओ नेताक लोभ सँ, जकडा रहल अछि देश, विदेशीक पाशामे।
एतेक कठीन आ दूर्लभ मनुष्‍यक जीवन पाओल स्‍वर्ग समान एही मिथिलामे
मूदा लगैछ जे जन्‍मजाते अभागल थिकहुँ जे दूर्दशा होइत देखैछी, मिथिलाके अपन आगामे।
 सम्‍पूर्ण श्रृंगार सँ सुशोभित जगतक माय ओ विलक्षणा सीता आई घरसँ निकालल जाऽरहल अछि
मिथिलावासी एम्‍हर ओम्‍हरक वात सुनैत, घरक एकटा कोनामे बहादुरी देखाबि रहल अछि।
भऽरहल अछि सस्‍ता रँग सँ शोणीत जाहिसँ सब छथि नहाएल
कतेक दिन सऽब चुप्‍पे रहतै, बैसतइ एना नुकाएल?
ताहि सँ,
एहि स्‍मिताक लडाईमे बचने मात्र सँ काज नई चलत
सम्‍पूर्ण मैथिलमे नव चेतना भरैत, सबके लडहिटा पडत।

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