श्याम सुन्दर शशि

श्याम सुन्दर शशि

जनकपुरधाम, नेपाल। पेशा-पत्रकारिता। शिक्षा: त्रिभुवन विश्वविद्यालयसँ, एम.. मैथिली, प्रथम श्रेणीमे प्रथम स्थान। मैथिलीक प्रायः सभ विधामे रचनारत। बहुत रास रचना विभिन्न पत्र-पत्रिकामे प्रकाशित। हिन्दी, नेपाली आ अंग्रेजी भाषामे सेहो रचनारत आ बहुतरास रचना प्रकाशित। सम्प्रति- कान्तिपुर प्रवासक अरब ब्यूरोमे कार्यरत।सम्‍पादक


मरदे कि बरदे

भगवान भाष्करक प्रचण्ड प्रतापकेँ सम्हारि सकब धरती मैआक वास्ते कठिन भऽ रहल छलनि। मैया अपरतीव छलीह। चण्डलवाक प्रलयंकारी रौद्र अवतारसँ अपने बाचथु कि अपन सखा सन्तानकेँ बचाबथु? अपन मथा साहुर, साहुर करबाक अवस्था सेहो नहि छल। मिथिलाक धरती थोरै छैक जे यत्र तत्र सर्वत्र हरियरी रहतै। लोक अपनो जुराएत आ लोकोकेँ जुरौतैक? ई कतार छै भाई। कतार। एत्त गाछ वृक्ष कत पावि? धनीमानीलोक ऐजुवा (वगैचा) लगबैत छथि। जेना लोक धीया पूताकेँ दूध पियाकऽ पोसैत अछि। तहिना पोसैत अछि एतुका सेखसभ गाछ-वृक्ष। ककरो मजाल छै जे ओहि गाछक नीचाँ सुस्ता लेत..। तुरन्त वन-विनाश कानूनक अन्तर्गत शख्त कार्यवाही भऽ जएतैक। आ ओऽ गाछ वृक्ष होईतो नहि अछि सुस्तैवा योग्य। एक कविक कवित जकाँ वड़ा हुआ तो क्या हुआ लम्बे पेड़ खजुर। पंछीको छाया नही फल लागे अति दूर.. डारँ मोरवाक योग्य छाहरि नहि। बूझि परैत छल, दोहाक समुद्र वाष्‍प भऽ कऽ उड़ि जाएत। सड़क उपरके अलकरा पघलि रहल छल। सरकार एहि गरमीक महिनामे दुपहरमे काज करबापर पाबन्दी लगौने छैक। तथापि देश विदेशक मजुरसभ अपन-अपन ओभर टाईम पका रहल छल। भगवान भाष्करसंगक महासमरमे लागल छल। धरती पुत्रलोकनि। धरती तँ आखिर धरती छैक ने। अपन जनम धरती हो कि करम धरती...।

एहि रौदसँ बेपरवाह लक्ष्मण पैघ-पैघ डेग मारैत आगाँ बढ़ि रहल छल। कोनो अभेद्य लक्ष्यकेँ भेदन करबाक योजनामे आगू बढ़ि रहल चोटाएल, हारल योद्धा जेकाँ। एहि बेरक समरमे विजयश्री प्राप्त करबाक दृढ़ सन्कल्पित छल ओऽ। ओकरा ठेकान नहि छलै जे ओकर समग्र देह घामे पसिने भिजी गेल छैक। ओऽ कारी झामर भऽ गेल अछि। ओऽ बस आगू बढ़ि रहल छल, अपन गंतव्य दिस। ओकर गन्तव्य छलै, दोहाक अतिव्यस्त इलाकामे अवस्थित नेपाली दूतावास। जतए ओकर प्रेयसी गत एक सप्ताहसँ शरणागत छैक। मुदा किछुए किलोमीटरक दूरीपर अवस्थित रहलाक बावजूदो ओऽ हुनकासँ भेटि नहि सकल अछि। ओऽ सीधा दूतावासमे प्रवेश कएकऽ मुदा तुरन्ते पाछाँ घुमि गेल। चार दिवालीक ओटमे ठाढ़ भऽ जिन्सपेन्टक पछिला जेबीसँ कंघी निकाललक। केस सीटलक। कपड़ा मिलौलक। आ कनेक सतर्क कदमसँ दूतावासक मेन गेटकेँ पार कएलक। दूतावास परिसरमे रहल नेबोक गाछक ओटमे बैसि ओकर प्रेयसी केस झारि रहल छलै। ओएह घुरमल-घुरमल केस। सुराही सन कमर आ सुडौल शरीर। पीठपर करिकवा तिलसँ ओऽ आओर निधोख भऽ गेल। ओऽ ओकरे रेशमा छैक। आगूसँ देखू कि पाछोसँ। ईस्स। ओकरा मोनमे टिस जेकाँ उठलै। मोन भेलै जे पाछेसँ जाऽ भरि पाजकँ पकड़ि ली आ गत ९ महिनाक हिसाब-किताब माँगी। ओऽ आगू सेहो बढ़ल मुदा रेशमाक केश जखनसँ खुजल रहैक तखनेसँ दूतावासक चौकीदार सेहो ओकरे दिस ताकि रहल छलै। लक्ष्मणकेँ हिम्मति नहि भेलै अपने प्रेयसीक हाथ धरि पकड़बाक। जहन दुनूक आँखि मिललैक तँ दुनूक नयनसँ अनन्त अश्रुधारा बहि गेलै। एक दिस लक्ष्मण छल, दोसर दिस रेशमा आ बीचमे रहैक गाछ। जकरा साक्षी राखि दुनू ९ महिनाक हिसाब किताब फरियौलक। लक्ष्मण एतबे बाजल “हम तँ बरद जेकाँ बहिए रहल छी, एहि मरुभूमिमे, अहाँ दुधपिया बौवाकेँ छोड़िकऽ किएक आबि गेलौ?

कतारक मैथिल भेड़ा चरवाह-

कतारक सदरमुकाम दोहासँ लगभग एक सय किलोमीटर दूर जमालिया स्थित मरुभूमिक छातीपर बनाओल गेल भेड़ाक गोहियाक आगू ठाढ़ भऽ एक गोट युवक सिटी बजा रहल छल। महाभारतकालीन कृष्ण जकाँ। जनु अपन गोप आ गोपीकेँ लग बजेबाक उपक्रम कऽ रहल हो। मुदा एहि मरुभूमिमे ने गाई अएबाक कोनो सम्भावना छलै आ ने गोपी। मुदा बकरी आ भेड़ा धरि अवश्य आबि गेल ओकर सिसकारी सुनिकए। दिनभरि ५० डिग्रीक ताप छोड़ि स्वयं थकित सुरुज भगवान संध्या रानीसँ रसकेलि करबाक धुनमे पश्चिमाचलगामी वाट पकड़ि लेने छलाह। पश्चिमसँ आवएवला सेनुताएल प्रकाश मरुभूमिक वालुपर पड़ि मलिछाह आकृति बना रहल छल। मरुभूमि पिलिया ग्रस्त रोगी जकाँ बेजान देखना जाऽ रहल छल। पछिया हवा सांय सांय कऽ रहल छल। हावाक गतिसंग वालुक छोट-छोट कण उड़ि-उड़ि राहगीरकेँ घायल बना रहल छल। बूझि पड़ैत छल जे प्रलयकेर पूर्व संकेत हो। चारुकात वियावान मरुभूमि आ एहिमे उगल एक आध बबूरक पौध। हम बेर-बेर सोचैत रहैत छी जे धन्य बबूर, ऊँट आ सार्कदेशक दुखिया मजुरसभ जे एहि भूमिकेँ धरती होएबाक ओहदा प्रदान करैत छैक। अन्यथा...??

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मुदा ओऽ युवक शान्त छल। एक क्षणक बाद सुरुज अस्त भऽ जएतै, सगर सन्सार अन्हार भऽ जएतै आ सयौ विगहामे पसरल मरुभूमिपर कारी रंगक चादर ओछा जाएत। ओऽ अन्हार होएबासँ पहिनहि अपना अधकि भेड़ा आ बकरी गोहियामे घुसियावए चाहैत छल। कर्तव्य परायण मनुपुत्रक रूपमे अपन दायित्व निर्वाह करए चाहैत छल।

एहि तरहेँ अपन ईसारापर कृष्ण जकाँ भेड़ा-बकड़ीकेँ नचावएवला युवक के नाम छल महेन्द्र कापर। नेपालक सिरहा जिल्लाक कमलाकात भेड़िया गामक ई मैथिल युवक, विजुली, पिवाक पानि, सड़क आ स्वास्थ्यादि सुविधासँ विहीन एहि मरुभूमिमे गत एक वर्षसँ एहिना भेड़ा वकरी चड़वैत अछि। महेन्द्र कापर मात्र नहि, एहि मरुभूमिक विभिन्न भागमे बनाओल गेल विभिन्न भेड़ा, बकड़ी आ ऊट बथान तथा लगाओल गेल वगैचामे हजारौं नेपाली, भारतीय, वंगलादेशी, श्रीलंकन आ सुडियन मजुरसभ काज करैत अछि। अपना सभ दिस एक गोट कहबी नहि छैक जे, “जएवह नेपाल, संगहि जएतह कपार”। तहिना ई युवक सभ अपन करम भोगि रहल अछि। ओऽ सभ अबैत काल जे दोहा देखने छल, चकमक विजुलीवत्ती देखने छल आ चिक्कन चुनमुन फोरलेन सड़क देखने छल से घुरैत काल फेर देखत। ओकरा सभक वास्ते दोहा सहर दिल्ली दूर छैक।

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महेन्द्र जमालियाक एहि अन्कन्टार मरुभूमिमे गत एक वर्षसँ काज करैत अछि। ओकरा जिम्मामे दू सय भेड़ा आ बकड़ी छैक। हमरा सभकेँ देखिते ओकर आँखिमे विशेष प्रकारक चमक व्याप्त भऽ गेलै, मुखमण्डलपर खुशीक रेखा नाचए लगलैक। साँझ पड़ि रहल छैक ओकरा लालटेम नेसवाक छैक, रातुक खाना बनेवाक छैक आ खुला आकाशक नीचाँ तरेगन गनैत राति बितेवाक छैक। गत एक वर्षसँ महेन्द्रक ई दैनिकी बनि गेल छैक। ईजोरिया रातिक चानकेँ देखि ओऽ अतिशय प्रसन्न होइत अछि, “ई चान हमरो बाऊ आ माय आउर सेहो देखैत होतै नञि”? ओकर निश्चल प्रश्न हमरा भावुक बना देने छल।

ओऽ भेड़ा आ बकरीकेँ गोहियामे गोतैत अछि। पठरूसभकेँ दूध पियबैत अछि। चारा रखैत अछि आ चैन भऽ हमरा सभसँ गप्प करवा वास्ते बैसि जाइत अछि। ओऽ एक वर्ष पूर्व कतार आएल छल। मानव तस्करसभ ओकरा कहने रहैक जे वगैचाक काज छैक। ओऽ सोचने रहय जे फलफूलमे पानि पटाएव, रोपव उखारव आ रियाल कमाएव मुदा से भेलै नहि। ओऽ भेड़ा चरवाह बनि कऽ रहि गेल। असलमे महेन्द्र अपने निरक्षर अछि। ओकर कतार आगमनके उद्देश्य छलै गाममे घर बनाएव आ बेटा-बेटीकेँ बोर्डिंग स्कूलमे पढ़ाएव। मुदा ओकर एक वर्षक श्रमसँ ई संभव नहि भऽ पाओल छैक। एक वर्षमे तँ महाजनकेँ ऋणो नहि फरिछाओल छैक। एहि वास्ते ओकरा आओर दू वर्ष एहि मरुभूमिक वालुकेँ फाकय परतैक। अवैत काल दलाल ओकरासँ ७५ हजार रुपैया लेने रहैक। जे ओऽ महाजनसँ ऋण लऽ कऽ चुकता कएने छल।

जहन महेन्द्रक गप्पक बखारी खुजलै तँ फेर बन्द होएवाक नामे नहि लैक। ओकरा तँ ओहि गोहियामे राति बितैवाक छलै मुदा हमरा सभकेँ सय किलोमीटर दूर दोहा अएवाक छल। हमरा सभक धरफड़ीकेँ ओऽ अकानि गेल छल। कहलक सर, कहियोकाल अवैत जाइत रहब। भेड़ा बकड़ी संगे रहैत-रहैत ओहने भऽ गेल छी, देखियौ चाहो पानिक लेल नहि पुछलहुँ। आ कपड़ा लपेटल एकगोट पानिक बोतल आगाँ बढ़ा देलक। “हमरा सभक फ्रिज बुझू कि एयर कन्डीशन ईहे अछि”।

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गर्मीसँ सुखाएल कण्डकेँ पानिसँ भिजाओल आ अपन गन्तव्य दिस आगाँ बढ़ि चललहुँ। लगभग दश किलोमीटर वाट तय कएलाक बाद हमरा लोकनि जमालिया नगरमे पहुँचलहुँ। मुसलमान धर्मावलम्बी सभक रोजा खोलवाक समय भऽ गेल रहै। सड़क कातमे बनाओल गेल चबुतरापर नाना प्रकारक व्यंजन साँठल जाऽ रहल छल। लोक विस्मील्लाह करवालेल तैयार छलाह। हमरा मोन पड़ल महेन्द्रके गोहियामे राखल खवुज (कतार सरकारक सस्ता दरक रोटी) आ प्याउजक धेसर। एसगर महेन्द्र एखन नून, मिरचाई आ तेल प्याउजक संग खवुज दकरि रहल हएत। एतए ओकरेद्वारा पोसल गेल खस्सीक विरयानीक स्वाद लऽ रहल अछि मालिक आउर।

दोहा, कतार, जमलिया।

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